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Monday, June 29, 2009

Maybe

I keep my soul enclosed somewhere, maybe in my body

I see love somewhere, maybe because I don’t see hatred

I feel pain somewhere, maybe I created in mind

I want to run somewhere, maybe just in dreams

I want to hide somewhere, maybe from myself

I want to go to heaven, maybe to see if that’s a truth

I keep myself alive, maybe just to know if I can

Monday, June 15, 2009

ढूँढता हूँ

This I wrote like few months ago. Just wrote 4 lines; thought I would add more lines in future, but could never do so. As said by some great lady (name doesn't matter, as its poem that makes a poet and not the vice-versa), a poet catches the poem flowing through air and it's never easy to catch that poem again. Though calling myself poet would be derogatory to the real poets, but still. Sorry for such a big introduction for just 4 lines of poem.

कांटो की चुभन से डरता हूँ
जलते हुए ख्वाईशो से लड़ता हूँ
दर्द--जुबा दोनों की सुनता हूँ
आहो में जीने की आस ढूँढता हूँ

Monday, May 11, 2009

I am THE

I am the voice that pain asks to speak

I am the friend that lovelorns pokes to share

I am the son that longs to see his mother

I am the arrow that has target in sight

I am the night that day is hiding behind

I am the history that future has learnt from

I am the song that I want to sing now.

Saturday, October 25, 2008

Tosey Mili .....

कीट को शमा में जलने का अरमान क्यों है

कीट के जलने को शमा से क्या है

जलने को शमा का एक तिनका ही काफ़ी है

शमा को क्या पता कोनसा कीट उसके लिए ही जलता है


Song of the moment : Tose naina laagey, Tosey man ja laagey mili zindagi, Tosey mili jo yeh zindagi, To mar hi gaye hum – “Anwar” and “Dev” mixed.

Thursday, October 9, 2008

Take Me Away

This was meant to be on blog or diary two months back, but for some pessi-mystic reasons dropped any such idea. So here it goes on formal draft and assuming its still August, 2008…

Had Knee surgery in June, 2008; wasn’t able to lift up my right leg on my own and was on bed all the day and now today ran some 200 meters for some 5 minutes or so and please don't start mind calculator to measure the speed or pace or velocity or whatever, as I was running on the sidewalk of a street. But............ Woah!! The last time I remember running like this was some 2 years or so back. Well the background story is I had accident and had 2 surgeries for the same, and this was one the second one, and now after feeling much better I finally decided to run to gain some sense of recovery. I hope to do more in sports as wasn’t able to do much in that because of the accident.


I am listening to “Take me Away - 4 Strings” and winding up this history page…


Take me away
Waited all my life

This day was special

As I felt you

You can

Only you can take me away

Take me away from myself

Thursday, August 7, 2008

चलते चलते ...

चलते चलते युही कोई मिल गया था
सरे राह चलते चलते
वोही थम के रह गई थी, मेरी रात ढलते ढलते
चलते चलते युही कोई मिल गया था
जो कही गई मुझसे, वोह दिल सुन रहा है
की फ़साना बन गया है, कोई अपना तकते तकते
चलते चलते युही कोई मिल गया था
शब् इंतजार आख़िर, कभी होगी आखिरी भी
यह चिराग बुझ रहे है, शमा में जलते जलते
चलते चलते युही कोई मिल गया था

Tuesday, July 8, 2008

कुछ ...

रात तो बहुत थे दिल के शोर में डूबे, कुछ आरजू और कुछ रुसवाइयों में उड़ गए
दर्द तो बहुत मिले, कुछ आंसूयों में और कुछ रात में पूछे गए सवालों में सह गए
साथ देने को तो बहुत साथी मिले, कुछ मेरी बेपरवाही और कुछ मेरे परवाहो की नासमझी में खो गए
दिल की बातें तो बहुत थे, कुछ बेनाम और कुछ बदनामी की परवाह में मिट गए
ख्वाईशें तो बहुत थे, कुछ कल की काली परछाइयों और कुछ आज के बेबसी में चुप हो गए
शायरी तो हमने भी कभी की थी, कुछ शब्दों की दूरी और कुछ अनसुलझे जस्बातों में अधूरे रह गए

Sunday, June 22, 2008

My Dreams

I sat down to write a poem that would encompass all about my dreams on this cool monsoon day. I have these dreams since I started day-dreaming. I am sure this one-day dream of mine will soon come real to me. Thinking about my dreams I have always thought that I would love to go to a jungle with a river and lots of animals around, of course not dangerous ones. Well it has two reasons, as I see the God there in nature, and also love the nature. I guess, all these things relate with each other somehow in my mind. The materialistic thoughts also entertain me, but not as much as other simpler precious things.

एक दिन हो ऐसा दर्द की दर्दों के बग्यैर
हो खुला मैदान और ठंडी हवा की सहर
बादल बरस के करे तन-मन को तृप्त
नाचू जैसे मोर पपीहा और हो जाऊ संलिप्त
नदियों के बहतो पानी की बोलू वाणी
कीचड़ में उछलू जैसे कोई जंगली प्राणी
वन में वास का मुझे है यह एक सपना
इन रंगों में समां जाऊ, इतना ही ख्वाब है अपना

है खुदा मेरा उसी वन में
देखू इशु को सब प्राणों में
मेरा भगवान वोही जो मुझे सबसे जोड़े है
धरम मेरा वोही जिसमें उस इश्वर की सेवा है
ख्वाइश येही की इन जीवो में लीन हो महसूस करू वो ज्योत
सपना मेरा वोही की महसूस करू अपने जनम का स्रोत

जन्नत वोही है जहा सुकून हो
सुकून ऐसा की मौत का डर न हो
शायद इसलिए मेरे सपनो में ही वो जन्नत है
सपनो की राहे आस पास है, दिल कहता है
सपनो का जहाँ यह ख़ास है, इसमें बस जस्बात है
सपना मेरा एक दिन का ही सही, जन्नत सा ख़ास है

Friday, June 20, 2008

कितने कदम कितनी दूर

कितने कदम कितनी दूर चला हू मैं, अंदाजा नही
चलना कितनी दूर है और, इसकी कोई ख़बर नही

थके पैर सताए हर रात
पूछे …
कितनी दूर है मंजिल
दिखे न कोई हम-काफिल
क्या तू है इस ज़िनदगी के काबील
और कहे …
थक के चूर हू, पर हारा नही
तेरे आसू मुझको गवारा नही
साथ निभाया है अब तक
पहुचेंगे जरुर उस फलक तक
बस दिल में हिम्मत हो हर घड़ी
ए दोस्त है येही बात सबसे बड़ी

मैं कहू,
सीने में एक मलाल है
तुझे दिए कितने दर्द इसका ख्याल है
पुछु …
शिक्वाह तो तुझे भी होगा की क्या अस्फारिक मिला
होगा तो तुझे भी कोई गिला
और कहू …
साथ का शुक्रिया, अहसान है तेरा
तू है जीने का अहम् जरिया, भरोसा है मेरा
सफर का पता नही, अब न कोई गलती होगी
न जाने कब यह सफर पुरी होगी
पता नही और कितनी कदम कितनी दूर

वो बोला, हम है साथ हो जितने कदम जितनी दूर

Wednesday, June 18, 2008

समझ नहीं पाता हू

कभी कभी इन् मत्लबो के लबो को समझ नहीं पाता हू
की यह लब इतने डूबे हुए क्यों है की दुसरो को देख नही पाते है

कभी कभी इन् धर्मो के कर्मो को समझ नहीं पाता हू
की यह कर्म इतने तंगी क्यों है की असली धर्म को भूल जाते है

कभी कभी इस प्रगति की गति को समझ नहीं पाता हू
की यह गति इतनी आपी क्यों है की ईमान खोये जाते है

कभी कभी अपने वाकैयो के आक्रयो को समझ नहीं पाता हू
की यह अक्राए कहे समझे जो तेरे कलम चल धुंड लाते है

Sunday, June 15, 2008

एक छोटा सा जहाँ हो


एक छोटा सा जहाँ हो
घरवाले और दोस्तो का साथ हो
इन के संग किसी महफील का समां हो

एक चोटी सी सुबह हो
नीला आसमां और हरी घास हो
इन के साथ मैं कर रहा आलिंगन हो

एक चोटी सी रात हो
प्यारा चांद और यादों की ठंडी हवा हो
इन में रमके दिल मेरा जावा हो

एक छोटा सा गीत हो
प्यारे अल्फाज़ और हाल-ऐ-दिल बयां हो
इन में सजके संगीत किसी सम्मेलन में कहा हो

एक छोटा सा दिल हो
जिसके साथ हसके गुजारु बस एक लमहा हो
इन खवाइशों के जंगल में कोई छोटा सा फूल खिला हो

खावाइशें कितने भी हों पर माँ तेरा साथ हर जगह हों

Wednesday, June 11, 2008

कहाँ!


रात की इस तन्हाई का आलम है, दिल में यह शोर कैसा
दर्द के इस बबेसी की तड़प है, उसपे यह सुकून कैसा

अरमानों के जंगल में अँधेरा है, दूर वो महल किसका
सुबह के बादल पिछली रात से ठहरे है, इनको इंतज़ार किसका

आसमां सुना है, हवा मद्धम है, यह उठी पुरवाई क्यों
उसकी याद में जल रहा जिया मेरा, और उसकी बेपरवाही क्यों

उमीदों और दिल के कशमकश के बिच वो मझधार कहाँ
इस बदले रंगीन सागर में वो उचा रोशन मीनार कहाँ

सबकी दुआयों के बिच टूट रहा क्यों आशियाँ मेरा
ढूंढू वो राहे फिरसे जिनसे होकर जुजरा बचपन मेरा

देने को प्यार की नदियाँ है, पर लेना वाला वो सागर कहाँ
कहने को ढेरों बातें है, पर फीर भी वो अल्फाज़ कहाँ

Tuesday, June 10, 2008

धुन्दता है


कभी कभी इस शायर की शायरी सुखी जान पड़ती है
मिल जाये कोई भीगा कलम, धुन्दता है
कभी कभी यह मंजिले आस्मान से दूर नज़र आते है
छु सके कोई फलक, धुन्दता है


कभी कभी कई वाक्य लफ्जों से परे लगते है
कर सके बयान उस अकेली रात का आलम, धुन्दता है
कभी कभी भगवान के इन फासलों के फलसफो से डर लगता है
है कौन सी वो मंजिल जो हो उसके पास, धुन्दता है

Thursday, April 3, 2008

उड़ चला कोई ...

दिल के नजदीक जलती है एक चिंगारी
सबसे बेखबर परदे के पीछे चलती है एक कृत्य
सूखे रेगिस्तान में तड़प रहा एक उदर
बंद संदूक के अन्दर शोर है एक विचित्र
शांत झील के किनारों में हो रहा है कोई कम्पन
छुने को जग सारा उड़ चला कोई कटी पतंग

Wednesday, February 20, 2008

एहसास है जो रुकता नही .....

दिल है जो तनहा होके भी दफूर नही
ऑंखें है जो थक के भी क्रूर नही
पैर है जो लाचार होके भी चूर नही
िंजंदगी है जो बेजार होके भी मजबूर नही

Friday, January 11, 2008

कहना ना था .....

तन्हाई के इस रात में कोई अपना ना था

जो अपना था वो पराई दुिनया का रहनुमा था

बहती हवा के झोकों में िकसी खुश्बू का अहसास ना था

जो अहसास था वो असल में मेरे ही ख्वाबों का आइना था

िदल को तोडनेवाला कोई और ना था

वो मेरे ही बेबसी का एक फलसफा था

गुजरते हुए इन् लम्हों में कुछ और कहना ना था

जो कहना था वो इस कागज़ कलम और मेरे बीच ही रहना था

Tuesday, December 25, 2007

ख्वाब धुन्दला सा











ख्वाब इतने सारे है की हकीकत की गरीबी नज़र नही आती
यादें इतने सारे है की आगे की राह नज़र नही आती
धुन्दला आकाश अँधेरी रात में मंजील नज़र नही आती